काश!

काश! ये हिन्दी भाषा का बड़ा ही विचित्र एवं दिल को सुकून देने वाला शब्द
है। इस शब्द के जरिए हम ऐसी-ऐसी कल्पनाओं और परिकल्पनाओं के पुलिंदे बुन
सकते हैं, जो कभी तो हमको गंभीर कर दें तो कभी गुदगुदाने पर मजबूर। जैसे
कि “काश” मेरे पास एक अच्छी नौकरी होती तो मैं अपने परिवार को और अधिक
खुशी दे पाता, तो दूसरी ओर कोई यह सोचता है कि “काश” मेरी भी एक (या
ज्यादा) गर्लफ्रेंड होती तो उसे अपनी नई बाइक पर बिठाकर घुमाता। “काश”
शब्द तो एक है, लेकिन इसको इस्तेमाल करने का तरीका और उससे निकलने वाली
भावना तो व्यक्ति विशेष पर ही टिकी है।

इस शब्द को लेकर एक वाकया मेरे साथ हुआ। हुआ कुछ यूँ कि कुछ दिनों पहले
विश्वविद्यालय जाने का काम पड़ा। तीन युवकों का समूह मन को आनंदित कर
देने वाली एक अजीब-सी शांति में उद्यान में बैठ कुछ गुफ्तगूँ करने में
मशगूल था, क्योंकि मैं भी शांतिप्रिय व्यक्ति हूँ सो मैं भी उनके पास ही
जा पसरा। अब भी तीनों पहले की ही तरह अपनी बातों में व्यस्त थे। उस दृश्य
को देखकर ही मैंने उनके जीवन स्तर की कल्पना कर ली थी। वैसे भी आज के युग
में हम इतने आधुनिक (?) हो गए हैं कि केवल एक दर्शन मात्र से ही हम सामने
वाले के जीवन स्तर से लेकर उसके चरित्र तक का बखान कर सकते हैं। और, मुझे
लगता है कि आज केवल शिक्षा के मंदिर ही ऐसी जगह रह गए हैं, जहाँ हम समाज
के विभिन्न तबकों को एकसाथ देख सकते हैं। खैर! मेरी पलकें झपकने ही लगी
थीं कि मेरे कानों पर इसी विचित्र शब्द ने दस्तक दी- “काश”। समूह में से
एक युवक बोला- “काश” मेरे पास एक बाइक होती तो रोज के बस और वैन के धक्के
नहीं खाने पड़ते। इसको सुन दूसरा बोला-धक्कों का क्या है तू मेरी बाइक ले
ले, लेकिन काश! मेरे पास एक कार होती तो सिर्फ नेहा को घर छोड़ने की बजाय
साक्षी और श्रुति को भी घर ड्रॉप कर सकता। इतने में तीसरा बोला- कार का
क्या है यार तू मेरी ले ले, लेकिन काश! मेरे पास एक ई-क्लास होती तो बात
ही क्या होती। यह बातें सुनकर हँसी आना तो लाजमी था और मैं मन ही मन
मुस्कुरा भी रहा था, लेकिन मेरा मुख एकदम भाव-शून्य था। हँसी-मजाक में ही
सही, लेकिन एक रोचक पहलू सामने आया कि जो भी हो, यह शब्द है तो बड़े कमाल
का। यह शब्द मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली इच्छाओं के लिए है। जैसे
कि यदि किसी को कभी भगवान से एक वरदान माँगने का मौका मिले और वह पूरी
पृथ्वी की माँग कर ले तथा भगवान उसे वरदान स्वरूप पूरी पृथ्वी दे भी दे,
तब भी वह मनुष्य खुश होने की बजाय पहले यही कहेगा कि- यार काश!
ब्रह्माण्ड माँग लिया होता…। कुछ भी हो यह तो हुई कुछ मजेदार, लेकिन
स्वाभाविक बात, परंतु सौ बातों की एक बात तो यह है कि हमें संतुष्ट होना
आना चाहिए। इच्छाओं की पूर्ति तो संभव नहीं है, परंतु इच्छाओं का त्याग
अवश्य संभव है। यदि हमने संतुष्ट होना सीख लिया तो हम जीवन में ही
परम-आनंद को अनुभव कर सकते हैं। अंत में यही कहूँगा कि शाहरुख खान तो
कहता है कि “डोंट बी संतुष्ट” लेकिन मेरा तो मानना है कि “बी संतुष्ट”।
यही चाहूँगा कि काश! आप शाहरुख की जगह मेरी बात समझें

मनीष जैन

Image Source: [http://www.udc.edu/images/dcmd/Kaash.jpg]