Dr. Shyam Gupta Writes a Letter to the Prime Minister

श्रीमान आदरणीय माननीय प्रधान मंत्री भारत सरकार , नई दिल्ली …

                   आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, यद्यपि यह एक वैश्विक तथ्य है परन्तु मुझे लगता है कि यह अपने देश  व संस्कृति को बुरी तरह से नष्ट करने में रत है अतः मैं भ्रष्टाचार को रोकने के कुछ प्रारम्भिक उपायों पर अपने विचार  श्रीमान के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहता हूँ

– समाचार पत्रों व मीडिया के लिए आवश्यक निर्देश बनाए जाएँ – व्यर्थ के आकार -प्रकार सुन्दरता की बजाय साधारण पत्र निकालने चाहिए ताकि कीमत कम रहे, पत्र में व्यर्थ के हीरो-हीरोइनों के गोसिप-कालम, चित्र कालम, सिनेमा की तारीफें बंद कर देनी चाहिए, सेक्स से सम्बंधित,मीठी-मीठी बातें, काल गर्लों के प्रचार, खिलाड़ियों के बड़े बड़े अनावश्यक चित्र, कहानियां, प्रेम, विवाह घरेलू समाचार बंद करदेने चाहिए | पत्र के पेज कम होने से मूल्य स्वतः कम होगा, पत्र के खर्चे कम होंगें |

टी वी  अर्थात दृश्य मीडिया को भी खिलाड़ियों के, हीरो-हीरोइनों के,  व्यर्थ के इंटरव्यू, व्यर्थ के नाच-गानों, उछल कूद, भोंडे हास्य, फोर्थ अम्पायर, अदालत, विदेशी खेल आदि के सारे प्रोग्राम बंद कर देने चाहिए सिर्फ महत्वपूर्ण मैचों का ही प्रसारण हो –जिससे जाने कितनीविदेशी मुद्रा की बचत होगी, संस्कृति -प्रदूषण कम होगा और इन व्यर्थ के प्रोग्रामों के लिए, आसानी से मोटी कमाई के लिए  मची आपाधापी, स्टेज पर आने के लिए असंगत उपाय, रिश्वत खोरी, जिस्म फरोशी अदि भ्रष्टाचार के मूल कारण कम होंगे |

– राजनेताओं के लिए उचित निर्देश जारी किये जाएँ, नेताओं व सांसदों, विधायकों को पार्टीहित से पहले देश हित की लिए कार्य करना चाहिएपार्टी की मूल नीति यदि देश विरोधी  है तो पार्लियामेंट स्वतंत्र वोटिंग करें |

सांसदों आदि का वेतन व पेंशन पर कोइ अधिकार नहीं है क्योंकि वे जन सेवक, समाज सेवक हैं,  सरकारी सेवक नहीं, अतः बंद हो |

सांसद आदि के विशेष अधिकार व  संसद-निधि का प्रावधान बंद कर देना चाहिए, नेता सिर्फ सिफारिस करें, स्वयं शासन का भाग न बनें|

नेता ,सांसद आदि किसी भी सरकारी, प्राइवेट दफ्तर अदि में अफसरों  से मिलें  नहीं, सरकारी कार्य का भाग न बनें, लोगों को लेकर काम कराने स्वयं न जायं, सिर्फ पत्र लिखें |

नेताओं, सांसदों आदि को अपने क्षेत्र से अन्यथा राजधानी में कोइ फ्लैट/आवास न दिया जाय, सदा ही उसमें अवांछित गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है| सत्र के दौरान सम्मिलित-आवास होना चाहिए | सत्र के अलावा कोई नेता, सांसद आदि राजधानी न आये–जाए, रेल व हवाई टिकटभी सिर्फ सत्र के लिए ही दिया जाय, वे बार बार कार्यालयों का दौरा न करें –मुख्य कार्यपालकों से ही रिपोर्ट लें, ट्रांसफर, पोस्टिंग, शासकीय आदेश पारित न करें | सिर्फ नीतिगत वक्तव्य ही दें |

३ न्यायालय की कार्यप्रणाली संबंधी बदलाव —- न्यायालय के विरुद्ध कुछ भी कथन, टिप्पणी आदि  अवमानना  मान लिया जाता है, जो नागरिक के अधिकार का हरण है …अवमानना न्याय की होती है…..न्यायालय  न्यायाधीश की नहीं —अवमानना न्याय की नहीं होनीचाहिए ..यदि कोई न्याय द्वारा पारित आदेशों का पालन नहीं करे तो वह अवमानना हो सकती है परन्तु टिप्पणी व राय प्रस्तुत करना नहीं, न्यायालय में न्याय-आसन पर उपस्थित न्यायाधीश के न्याय के विरुद्ध  कथन अवमानना है परन्तु अन्य स्थान पर उनके विरुद्ध कोई कथन या व्यक्तिगतकथन आदि  न्याय के नहीं, सामान्य नागरिक के सन्दर्भ में माना जाना चाहिये | होता यह है क़ि नागरिक का कुछ भी बोलना अवमानना मान लिया जाता है और जनता में व्याप्त भय भ्रष्टाचार का कारण बनता है |

 स्वयं संज्ञान लेना— होता यह है क़ि प्रायः तमाम व्यक्तिगत कारणों से न्यायकर्ता, स्वयं संज्ञान के अधिकार का प्रयोग करके किसी को भी वारंट तक भेज देते हैं जो भ्रष्टाचार का कारक है | अत्यंत आवश्यक समाज व जन-जीवन से सम्बंधित कलापों के अन्यथा यह अधिकार नहीं होनाचाहिए, इस अवस्था में वे स्वयं न्यायकर्ता न होकर, सामान्य व्यक्ति की भाँति नियमानुसार अन्य अदालत में अपना वाद पेश करें |

 कहीं भी न्यायालय — न्याय सिर्फ न्याय-आसन पर ही होना चाहिये, कहीं भी या घर पर नहीं, नियमित रूप से पूरे समय चेंबर में न बैठना भी एक बहुत बड़ी असुविधा है न्याय के लिए, और “न्याय में देरी का अर्थ न्याय न मिलना ” जैसे जुमले इसीलिये बन जाते हैं |

विशेष अधिकार — न्याय कर्ताओं को सुविधा आदि के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की भाँति व्यवहार नहीं करना चाहिए, विशेष अधिकार भी अनाधिकार चेष्टा को प्रश्रय देते हैं |


४-  सरकारी संस्थाओं के लिए कठोर नियम — एवं नियमों, कानूनों का कठोरता से पालन ताकि कोई भ्रष्ट बचने न पाए|

 सरकारी व प्राइवेट सभी दफ्तरों आदि में पारदर्शिता के उपाय करने चाहिए, प्रत्येक कार्य के लिए समय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए |

५- मानवीय लिप्सा व सुविधाभोगी संस्कृति की रोक थाम के लिए उपभोगी वस्तुओं के खरीद व विक्री पर रोक थाम लगानी होगी, कठोर नियम बनाने होंगे —विज्ञान, तकनीक, व आधुनीकरण के अन्धानुकरण में हर जगह वातानुकूलित संयन्त्र, हर हाथ में अनावश्यक मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटोप,आई-पोड आदि – चार घर, चार कार, चार एसी, चार लेपटोप वाले घर व्यक्ति को रिश्वत खोरी की और आकर्षित करता है | 

अधिक विदेशे क़र्ज़, पैसा-कमाई व विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा अनावश्यक अधिक मोटी-मोटी पगार – शेयर, बचत, विदेशी-कर्ज़, लोन-संस्क्रिति के कारण की नीति को बदलना होगा इससे भ्रष्ट-आचरण व भ्रष्टाचार को पैर पसारने की अनुमति मिलती है।

बहुत से अकर्मों को प्रश्रय न देना — शेयर, अनावश्यक बचत, अधिकाधिक खेल, संगीत,मनोरंजन, फ़ूहड-हास्य, शास्त्र-धर्म-न्रीति के विरोधी प्रहसन, सीरियल, नाटक पर कठोरता से रोक थाम करें |। विदेशी नकल पर नाटक, अन्ग्रेज़ी/ व हिन्दुस्तानी अन्ग्रेजों की लिखी, तथाकथित विदेशी पुरस्कार प्राप्त व्यर्थ की बडी-बडी पुस्तकें, प्रायोजित लेखकों, तथाकथित इतिहासकारों, कालम-लेखकों जो सिर्फ़ धन्धे के लिये, पैसे के लिये-– बच्चों, स्त्री, मनोविज्ञान  के नाम पर माता-पिता को सीख आदि द्वारा- आने वाली संतति में अश्रद्धा, अनास्था के बीज डालते हैं — उसे अनाचरण व भ्रष्टाचार के मार्ग पर जाने को जाने-अनजाने बढावा देते हैं ।

डा श्याम गुप्ता

लखनऊ

Image Courtesy: [The Viewspaper]

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